(लेख) विमर्श – नारी को पराधीन नहीं, संरक्षणीय मानने वाली सनातन दृष्टि

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             पार्थसारथि थपलियाल-
हाल में राहुल गांधी द्वारा पुणे में मनुस्मृति के संदर्भ में एक श्लोक के माध्यम से भारतीय नारी पर की गयी टिप्पणी ने एक अनावश्यक विमर्श खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी ने मनुस्मृति के इस श्लोक को महिलाओं की स्वतंत्रता विरोधी बताया – 
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥
अर्थात् “कौमार्य अवस्था तक पिता अपनी पुत्री की रक्षा (देखभाल) करता है। यौवन अवस्था में उसका पति देखभाल करता है। महिला जब वृद्ध हो जाती है तब उसका बेटा उसकी देखभाल करता है। इस प्रकार महिला कभी अकेली नहीं रहती है”। रक्षा के इस भाव में अधीनता का भाव नहीं है। भारत में स्वतंत्रता तो है लेकिन कुटुंब व्यवस्था में स्वतंत्रता मर्यादित है। वह भारतीय लोकतंत्र नहीं कि कुछ भी बोलते रहो।  संस्कृत भाषा में  ‘रक्ष्’ धातु का अर्थ मूलतः रक्षा करना, बचाना, सुरक्षित रखना, संरक्षण करना आदि अर्थ देता है। मनुस्मृति के उपलब्ध भाष्य में भी ‘रक्षति’ की व्याख्या संकटों और हानियों से बचाने के अर्थ में की गई है। अर्थात् इस श्लोक को आधुनिक राजनीतिक शब्दावली के ‘पुरुष के अधीन स्त्री’ के सरल सूत्र में बदल देना शास्त्रीय व्याख्या नहीं है। मनुस्मृति का दूसरा पक्ष क्यों नहीं बताया जाता? यदि मनुस्मृति पर चर्चा करनी है तो उसी अध्याय के अन्य श्लोक भी सामने रखने होंगे। मनुस्मृति कहती है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
अर्थात् जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सभी धार्मिक क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। इसके अगले श्लोक में कहा गया है-
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा॥
अर्थात् जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखी रहती हैं, वह शीघ्र नष्ट होता है और जहाँ वे दुःखी नहीं होतीं, वह कुल निरंतर उन्नति करता है। मनुस्मृति में पति-पत्नी के पारस्परिक संतोष को परिवार के स्थायी कल्याण का आधार मानती है-
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्॥
अर्थात् जिस कुल में पति पत्नी से और पत्नी पति से संतुष्ट रहते हैं, उस कुल में स्थायी कल्याण रहता है। सनातन परंपरा में संरक्षण का अर्थ स्वामित्व नहीं है। माता-पिता अपने बालक की रक्षा करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि बालक उनकी संपत्ति है। चिकित्सक रोगी की रक्षा करता है, इसका अर्थ यह नहीं कि रोगी उसकी संपत्ति हो गया। सैनिक सीमा की रक्षा करता है, इसका अर्थ यह नहीं कि सीमा उसकी निजी वस्तु है। इसी प्रकार ‘रक्षति’ को केवल ‘अधीन व्याख्यायित करना राजनीतिक धृष्टता है।हाँ, आधुनिक समाज में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वयस्क स्त्री को अपने जीवन के निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए? इसका उत्तर आज का भारतीय संविधान स्पष्ट रूप से देता है, स्त्री और पुरुष समान नागरिक हैं।भारतीय समाज में नारी, गृह की सदस्य नहीं, गृह की अधिष्ठात्री है। इस बात को वहीं समझ सकता है जो सनातन संस्कारों में पल्ला बढ़ा हो।
सनातन विवाह संस्कार में पत्नी को केवल पति के पीछे चलने वाली स्त्री नहीं माना गया। वह सहधर्मचारिणी है। विवाह का उद्देश्य केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और परिवार-व्यवस्था की संयुक्त यात्रा है। इस यात्रा में में पति-पत्नी सहनशक्ति और समझशक्ति से इहलोक और परलोक को सुधारने के लिए एक दूसरे में समाये हुए रहते हैं। हां, जो लोग संस्कार विहीन हैं, वे कुछ भी बोलें कुछ भी करें, उसे सनातन संस्कृति नहीं कहा जाता है। भारतीय विवाह में वधू को लक्ष्मीस्वरूपा और वर को विष्णुस्वरूप मानने की परंपरा इसी सांस्कृतिक प्रतीकवाद का हिस्सा है। विवाह के पश्चात् पत्नी को पति का ‘अर्धांग’ कहा जाना इसी भाव को व्यक्त करता है, दो शरीर, एक गृहस्थ-धर्म। भारतीय गृहस्थाश्रम में पत्नी केवल परिवार की व्यवस्था संभालने वाली नहीं, बल्कि धर्म-साधना की सहयात्री है। हिंदू विवाह संस्कार में वधू का वर के वाम भाग में स्थान ग्रहण करना केवल बैठने की व्यवस्था नहीं है। यह प्रतीक है कि गृहस्थ जीवन में पति और पत्नी को परस्पर विरोधी सत्ता नहीं, बल्कि पूर्णता के दो आयामों के रूप में देखा गया। रामचरितमानस में स्त्री की पीड़ा भी दिखाई देती है। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि भारतीय ग्रंथों में स्त्री की पीड़ा का कोई बोध नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस में सीता के विवाहोपरांत विदा होने के प्रसंग में जनकपुर की स्त्रियों के मुख से अत्यंत मार्मिक पंक्ति आती है-
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥
यह पंक्ति स्वयं बताती है कि भारतीय साहित्य ने स्त्री की पराधीनता को लेकर संवेदना व्यक्त की है। भारतीय परंपरा में स्त्री के जीवन की वास्तविक कठिनाइयों का बोध भी था और उसकी गरिमा की रक्षा का आग्रह भी। उसी रामचरितमानस का मूल दर्शन है-
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥”
अर्थात् सम्पूर्ण जगत को सीता-राममय देखकर तुलसीदास दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।ध्यान देने योग्य बात यह है कि तुलसीदास के यहाँ ‘राम’ अकेले नहीं हैं- ‘सीय-राम’ हैं।भारतीय जीवन में स्त्री के प्रति सम्मान केवल शास्त्रों में नहीं, भाषा और व्यवहार में भी दिखाई देता है- माता-पिता, सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, गौरी-शंकर जैसे युग्म हमारी सांस्कृतिक चेतना में स्त्री-पुरुष की परस्पर पूरकता को व्यक्त करते हैं। सनातन परंपरा ने स्त्री को संरक्षण’ का भाव उसकी गरिमा, सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा है। अलंकार के रूप में कहें तो सोना और लोहा दोनों धातुएँ हैं, लेकिन जिस वस्तु को अधिक मूल्यवान माना जाता है उसकी सुरक्षा की व्यवस्था भी अधिक सावधानी से की जाती है। यह उपमा सामाजिक अधिकारों का विकल्प नहीं, बल्कि भारतीय मानसिकता में ‘रक्षण’ के भाव को समझाने का माध्यम है।सनातन संस्कृति को समझना है तो केवल मनुस्मृति की आलोचना से नहीं, बल्कि वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, दर्शन, आचार-परंपरा और संस्कारों की समग्र यात्रा करनी होगी। मानव की स्मृति क्षणिक होती है लेकिन समय की स्मृति दीर्घकालिक होती है।नोट- लेखक के ये निजी विचार हैं .

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