(लेख) ऑल इंडिया रेडियो: 90 वर्षों से जन-जन का अपनापन

✍🏻 पार्थसारथि थपलियाल
“ दिस इज ऑल इंडिया रेडियो…” यह वाक्य केवल एक एनाउंसमेंट नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों, संवेदनाओं और राष्ट्रीय चेतना का अभिन्न हिस्सा है। रेडियो ने भारत को केवल समाचार नहीं दिए, बल्कि उसे एक सूत्र में पिरोने, संस्कृति को संरक्षित करने, लोकतंत्र को मजबूत बनाने और संकट के समय जनविश्वास कायम रखने का कार्य किया। 8 जून 1936 में Indian State Broadcasting Service का नाम बदलकर All India Radio (AIR) रखा गया था। 8 जून, 2026 को इस संस्था ने अपनी 90 वर्ष की गौरवशाली यात्रा पूरी कर ली है। यह यात्रा केवल एक प्रसारण संस्था की नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की यात्रा भी है।
तत्कालीन अंग्रेज सरकार के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद, बंबई रेडियो क्लब ने 23 जुलाई 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने बंबई और कलकत्ता से नियमित प्रसारण प्रारंभ किया। प्रसारण का शुभारंभ तत्कालीन वॉयस रॉय लॉर्ड इरविन ने बंबई में किया था। इसलिए भारत में आधिकारिक तौर पर इस दिन को रेडियो प्रसारण दिवस मनाते हैं। इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह कंपनी अधिक समय तक नहीं चल सकी। 1930 से 1932 के मध्य दो बार ऐसी स्थिति बनी जब प्रसारण बंद करने की नौबत आयी।
1932 में अंग्रेज सरकार ने भारत में प्रसारण व्यवस्था अपने हाथ में ले ली और इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस की स्थापना की। प्रसारण व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सितम्बर 1935 में लियोनेल फ़ील्डन को इंग्लैंड से भारत बुलाया गया। उन्होंने दिल्ली के 18, अलीपुर रोड स्थित एक पांच कमरों के मकान से 1 जनवरी 1936 को इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (ISBS) रेडियो का प्रसारण शुरू करवाया। लियोनेल फ़ील्डन को इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस नाम रुचिकर नहीं लगता था वे इस नाम को बदलना चाहते थे। एक दिन तत्कालीन वॉयस रॉय लिंलिथगो के यहां एक मिलन समारोह आयोजित था। उस दिन उचित मौका मिलते ही प्रसारण नियंत्रक, लियोनेल फ़ील्डन ने वाइस रॉय लिनलिथगो को अपनी उल्झन बतायी। लियोनेल फ़ील्डन का मानना था कि भारतीय लोग बहुत अटपटे ढंग से इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का उच्चारण करते हैं। यह बड़ा रोचक प्रसंग है। खैर, लिनलिथगो ने भारतीय प्रसारण व्यवस्था का नाम सुझाया- ऑल इंडिया रेडियो। इस नाम की पहली रेडियो उदघोषणा 8 जून, 1936 को पहली बार की गयी थी। इस वर्ष ऑल इंडिया रेडियो नाम के नव्वे वर्ष पूरे हो चुके हैं। उस समय रेडियो का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि प्रशासन, शिक्षा और जनसंपर्क का माध्यम बनना भी था। एक जमाना वह भी था जब गाने बजाने का काम महफिलों तक सीमित था।
3 जून 1947 को भारत विभाजन की घोषणा प्रसारण भवन, आकाशवाणी दिल्ली से हुई थी। 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि संविधान सभा, सभागार (संसद का सेंट्रल हाल) में आयोजित स्वाधीनता समारोह में लाॅर्ड माउंट बेटन ने सत्ता हस्तांतरण करते हुए भारत को स्वाधीनता देते हुए भारत की बागडोर पंडित जवाहर लाल नेहरू को सौंपी। कृषि कार्यक्रमों ने किसानों को नई तकनीकों से परिचित कराया। प्रयोगशाला में जो अनुसंधान हो रहे थे, उनकी जानकारी को किसानों तक पहुंचाने का काम ऑल इंडिया रेडियो ने किया। भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ। पिछले दौर के रेडियो श्रोता जानते हैं कि चेचक मुक्त भारत, बालमृत्यु में कमी, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य, टीकाकरण जैसे विषयों का व्यापक प्रचार प्रसार रेडियो के माध्यम से किया गया। राजस्थान में नारू रोग उन्मूलन और पोलियो मुक्त भारत जैसी उपलब्धियां बिना आकाशवाणी के संभव नहीं था।
बी. वी. केसकर जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे (1952-62), वे भारतीयता के पक्षधर थे। शास्त्रीय संगीत, भजन, लोकगीत उन्हें प्रिय थे फिल्मसंगीत को उन्होंने ज्यादा महत्व नहीं दिया। इसका असर यह हुआ कि श्रोता रेडियो सीलोन की ओर मुड़े। फलस्वरूप भारतीय प्रसारण व्यवस्था ने मनोरंजन चैनल के रूप में 1957 में विविधभारती प्रसारण सेवा शुरू की इसकी नींव डालने में पंडित नरेंद्र शर्मा की महती भूमिका रही। अनेक महान कलाकारों को राष्ट्रीय मंच मिला। पंडित नरेंद्र शर्मा ने इस प्रसारण व्यवस्था का गहन चिंतन किया था। आज भी सर्वाधिक सुनाई देनेवाली प्रसारण सेवा विविध भारती है। फिल्मी गीतों और हल्के-फुल्के मनोरंजन की बढ़ती मांग के बीच विविध भारती ने श्रोताओं के दिलों में विशेष स्थान बनाया। “हवा महल”, “जयमाला”, “छायागीत”, “भूले-बिसरे गीत” जैसे कार्यक्रम पीढ़ियों की स्मृतियों का हिस्सा बन गए। सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए प्रसारित “जयमाला” ने सेना और नागरिक समाज के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित किया।
3 अक्टूबर 1957 को ही ऑल इंडिया रेडियो का हिंदी नाम आकाशवाणी रखा गया। रेडियो ने भारतीय संगीत की परंपरा को घर-घर तक पहुँचाया। आज भी देश के अनेक दिग्गज कलाकारों की पहचान आकाशवाणी से जुड़ी हुई है। आकाशवाणी समाचार सेवा देश में सबसे विश्वसनीय समाचार स्रोत मानी जाती है। 1962 के चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध, करगिल संघर्ष, प्राकृतिक आपदाओं और राष्ट्रीय संकटों के दौरान लोगों की पहली पसंद रेडियो ही था। जब संचार के अन्य साधन सीमित थे, तब रेडियो ने जनता तक प्रमाणिक और त्वरित जानकारी पहुँचाई। ऑल इंडिया रेडियो/ आकाशवाणी को पल्लवित पुष्पित करने में जिन महान प्रसारकों का विशिष्ट योगदान रहा उनमें कुछ नाम हैं – लियोनेल फ़ील्डन, बुखारी ब्रदर्स, जगदीश चंद्र माथुर, ए के सेन, पंडित नरेंद्र शर्मा, भवानी प्रसाद मिश्र, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन, उपेंद्र अश्क़, पंडित रवि शंकर, अनिल विश्वास, मेलविल डी मेलो, कृष्ण चंदर, चिरंजीत, राजेंद्र बेदी, सआदत हसन मंटो, गिरिजा कुमार माथुर, दीनानाथ, बी. पी. दीक्षित बटुक, इलाचंद्र जोशी, गोपालदास, प्रभाकर माचवे,सिंह, जसदेव सिंह, के सी शर्मा भिक्खू, मुरली मनोहर मंजुल, के के नैयर, देवकीनंदन पाण्डेय, अशोक वाजपेयी, विनोद कश्यप, अनादि मिश्र, बोरोन हलदार आदि।
विकसित होते लोकतंत्र संसद, चुनाव, सरकारी नीतियाँ और राष्ट्रीय विकास योजनाएँ भी रेडियो के माध्यम से जनता तक पहुँचती रहीं। लोकतंत्र और जनसंचार के बीच सेतु बनाने में आकाशवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
रेडियो ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज को शिक्षित भी किया। सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में आकाशवाणी का अतुलनीय योगदान रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो अक्सर “चलता-फिरता विद्यालय” बन गया था। रेडियो कमेंटेटरों की आवाज़ें श्रोताओं की कल्पना में पूरा खेल जीवंत कर देती थीं। टीवी आने के बाद भी रेडियो कमेंट्री का आकर्षण बना रहा। कई पीढ़ियों ने विश्व कप, ओलंपिक और ऐतिहासिक खेल मुकाबलों का रोमांच रेडियो पर ही अनुभव किया।
आपदा और संकट के समय भरोसेमंद साथी भूकंप, बाढ़, चक्रवात और महामारी जैसे संकटों में रेडियो की उपयोगिता बार-बार सिद्ध हुई है।जब अन्य संचार माध्यम बाधित हो जाते हैं, तब भी रेडियो कम संसाधनों में कार्य कर सकता है। यही कारण है कि विश्वभर में रेडियो को आज भी आपदा प्रबंधन का प्रभावी माध्यम माना जाता है। भारत में भी अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आकाशवाणी ने राहत और बचाव कार्यों में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
1990 के दशक के बाद एफएम प्रसारण का विस्तार हुआ। निजी एफएम चैनलों के आगमन ने रेडियो जगत में प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी।आकाशवाणी ने भी एफएम गोल्ड, एफएम रेनबो और अन्य सेवाओं के माध्यम से आधुनिक श्रोताओं तक पहुँचने का प्रयास किया।युवा पीढ़ी की रुचियों के अनुरूप कार्यक्रमों का निर्माण किया गया। संगीत, संवाद और समसामयिक विषयों को नए रूप में प्रस्तुत किया गया।इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में रेडियो के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हुआ। किंतु आकाशवाणी ने स्वयं को बदलते समय के अनुरूप ढालने का प्रयास किया।
आज प्रसारण डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर उपलब्ध हैं। मोबाइल एप, वेब स्ट्रीमिंग और डिजिटल आर्काइव के माध्यम से श्रोता दुनिया के किसी भी कोने से भारतीय रेडियो कार्यक्रम सुन सकते हैं। रेडियो अब केवल ट्रांजिस्टर तक सीमित नहीं है, वह मोबाइल फोन, कार, कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से नए रूप में उपस्थित है। अब वह ओटीटी प्लेटफार्म waves पर भी उपलब्ध है। भारतीय भाषाओं और लोकसंस्कृति का संरक्षक आकाशवाणी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है भारतीय भाषाओं और लोक परंपराओं का संरक्षण। लोक संपदा संरक्षण के अंतर्गत देश की सैकड़ों बोलियों, लोकगीतों, लोककथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को रिकॉर्ड कर सुरक्षित रखने का जो कार्य आकाशवाणी ने किया, वह सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहर है। यदि आकाशवाणी न होती तो भारत की अनेक मौखिक परंपराएँ शायद समय के साथ विलुप्त हो जातीं। कितनी ही लोक परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन इन 90 वर्षों में आकाशवाणी ने किया।
बदलाव को आकाशवाणी ने आगे बढ़कर अपनाया। एनालॉग ब्रॉडकास्ट से डिजिटल युग में ओटीटी प्लेटफार्म waves से प्रसारण यात्रा की कहानी रोचक और अपनेपन के भाव से जीवित है। अंग्रेज सरकार के शासन काल में कभी श्रम मंत्रालय के अधीन, कभी उद्योग मंत्रालय के अधीन, कभी संस्कृति मंत्रालय के अधीन रहते हुए, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और अब प्रसार भारती के अंतर्गत परिवर्तन की सुर लहरियों को जनजन तक पहुंचा रही है। बदलाव में बहुत कुछ बदला है न बदला है लोक विश्वास। यही आकाशवाणी की सबसे बड़ी पूंजी है।
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लेखक ने 1978 से 2017 तक प्रसारण विधाओं में सक्रिय भूमिका निभायी। कई धारावाहिकों का लेखन और निर्माण किया। कई रूपकों का प्रसारण राष्ट्रीय स्तर पर कर चुके है। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन चल रहा है।



