न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक मैडिसन स्क्वायर गार्डन से गूंजा—“वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी” का वैश्विक संदेश

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  • “विविधता हमारी सुंदरता है, एकता हमारा सत्य”
  • ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में मानवता की एकता, सद्भाव, समरसता और वैश्विक शांति का हुआ दिव्य आह्वान
न्यूयॉर्क /अमेरिका : परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी, पूज्य स्वामी परमात्मानन्द जी, डॉ. मोहन भागवत जी तथा विभिन्न आस्थाओं के पूज्य धर्मगुरुओं का पावन सान्निध्य…न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ एवं ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ ने सम्पूर्ण विश्व को मानवता की एकता, विविधता के सम्मान, धार्मिक सद्भाव, संवाद और शांति का शक्तिशाली संदेश दिया।
इस भव्य आयोजन में भारतीय मूल के अमेरिकियों सहित विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों, आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेताओं तथा गणमान्यजनों ने सहभागिता की। 30 देशों के 180 धार्मिक नेताओं और 5,000 से अधिक भारतीय मूल के अमेरिकियों ने एक मंच पर एकत्र होकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्—सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है’ की भावना को साकार करने का संकल्प लिया। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हमारी आस्थाएँ, परंपराएँ और जीवन-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन हमारी आत्मा एक है और हम सभी एक वैश्विक परिवार के अंग हैं। यही सनातन धर्म और भारत की महान सभ्यता की मूल भावना है।उन्होंने कहा कि सनातन धर्म केवल किसी एक समुदाय के कल्याण की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के मंगल की कामना करता है—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
वेदों का संदेश “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” हमें सभी दिशाओं से श्रेष्ठ और कल्याणकारी विचारों को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
पूज्य स्वामी जी ने आह्वान किया कि प्रेम को कर्म, आध्यात्मिकता को आचरण, शांति को व्यवहार और सेवा को साधना बनाना होगा। हमारी विविधताएँ विभाजन नहीं, हमारी शक्ति बनें और हमारी आस्थाएँ संघर्ष नहीं, बल्कि संवाद एवं सद्भाव का माध्यम बनें। उन्होंने कहा—“आइए, हम केवल साथ उपस्थित होने का नहीं, बल्कि साथ चलने का संकल्प लें। यही सनातन का संदेश है, यही भारत की आत्मा है और यही वसुधैव कुटुम्बकम् की वैश्विक भावना है।” डॉ. मोहन भागवत जी Mohan Bhagwat ji ने भारतीय जीवन-दृष्टि की समावेशी चेतना को रेखांकित करते हुए कहा कि अलग-अलग मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जा सकते हैं और प्रत्येक मनुष्य की अपनी गरिमा है।उन्होंने कहा कि हमारी पूजा-पद्धतियाँ, परंपराएँ और जीवन जीने के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता की मूल चेतना एक है। विविधता प्रकृति का स्वभाव है और एकता उसके पीछे निहित सत्य है।उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अपनी पहचान और आस्था के प्रति श्रद्धा रखते हुए दूसरे की पहचान और आस्था का सम्मान करना ही सच्ची मानवता है। विविधताओं को समाप्त करना एकता नहीं; बल्कि विविधताओं को स्वीकार करते हुए उनमें निहित एकत्व को अनुभव करना ही वास्तविक एकता है। डा. साध्वी भगवती सरस्वती जी Sadhvi Bhagawati Saraswati ji ने हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए “असतो मा सद्गमय” के दिव्य मंत्र के साथ कार्यक्रम की ओपनिंग प्रेयर की।
उन्होंने प्रार्थना के माध्यम से अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य और विभाजन से एकत्व की यात्रा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब हम स्वयं को केवल शरीर, रूप, रंग, जाति, धर्म और बाहरी पहचान तक सीमित मानते हैं, तब भेद उत्पन्न होते हैं। परंतु जब हम अपने भीतर की शाश्वत दिव्य आत्मा को पहचानते हैं, तब भेद मिटने लगते हैं।हम अलग-अलग शरीर हो सकते हैं, हमारी पहचान और आस्थाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी आत्मा एक है। हम परमात्मा से जुड़े हैं, एक-दूसरे से जुड़े हैं और सम्पूर्ण सृष्टि से जुड़े हैं। यही है अंधकार से प्रकाश की, असत्य से सत्य की और विभाजन से एकत्व की यात्रा।इस अवसर पर विभिन्न आस्थाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के प्रतिनिधियों ने एक मंच पर एकत्र होकर यह संदेश दिया कि स्थायी वैश्विक शांति मतभेदों को मिटाने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने, सम्मान देने, संवाद करने और मिलकर मानवता की सेवा करने से स्थापित होगी। मैडिसन स्क्वायर गार्डन से उठी यह आवाज केवल एक कार्यक्रम की आवाज नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए एक आह्वान है—
एक विश्व।
एक मानवता।
एक परिवार।
एक चेतना। 
वसुधैव कुटुम्बकम्। 

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