उत्तराखंड का घ्यू त्यार…..प्रकृति व स्वास्थ्य को समर्पित खुबसूरत पर्व

आज ही नाग पंचमी का पर्व भी उत्तराखंड में मनाया जाता है खास कर कुमॉऊं क्षेत्र में

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त्यार (पर्व) अगर जानने हैं तो उत्तराखंड आ जाओ….हर हफ्ते एक पर्व निकल आएगा….ऐसा ही पर्व है घ्यू त्यार (घी संक्रांति जिसे हिंदी में कह सकते हैं)

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हरियाव (जिसे हिंदी में हरेला कह कर नाम ख़राब कर दिया है अब) के बाद यह त्यार सबसे ज्यादा सुन्दर और प्रकृति को समर्पित है. 

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इसके बाद सातों-हाठों  (पहाड़ी करवा चौथ नाम  जिसे समझने के लिए कह सकते हैं ) का पर्व सुन्दर तरीके से मनाया जाता है  

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इस दिन घी खाते हैं, घी का टीका लगाया जाता है, हाथ, पैर,गले, पेट, नाभि, कंधे, सर पर घी का टीका लगाया जता है, रोटी सब्जी दाल में तो ग्रहण करना ही होता है…

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मंदिर में पूजा करते समय घी चढ़ाया जाता है, घर में हर सदस्य को घी खाना होता है

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ऋषिकेश :  उत्तराखंड के प्रमुख लोकपर्वों में शामिल घ्यू त्यार (घी संक्रांति हिंदी में कह सकते हैं)  ग्रामीण क्षेत्रों में हर्षोल्लास एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई गई। कृषि, पशुधन एवं पर्यावरण से जुड़ा यह लोकपर्व उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और पहाड़ी जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है।
आज ही नाग पंचमी भी है —
आज ही नाग पंचमी का पर्व भी है….कुमाऊं में ख़ास तौर पर इस पर्व को काफी बड़े स्तर पर मनाया जाता है, आज के दिन मंदिरों में मेले लगते हैं. लोग शिव मंदिर,नाग देवता के मंदिर जा कार पूजा पाठ करते हैं….खास तौर पर बागेश्वर जिले के कांडा के विजय पुर इलाके में धौल नाग देवता का काफी बड़ा मंदिर हैं. बहुत बड़ा मेला लगता है. हजारों की संख्या में भक्त पहुँचते हैं आज के दिन. 
अंतरराष्ट्रीय गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डॉ. राजे नेगी ने घ्यू त्यार के अवसर पर प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति और विरासत में अनेक ऐसे लोकपर्व हैं, जिनका प्रकृति एवं ग्रामीण जीवन से गहरा संबंध रहा है। घी संक्रांति भी इन्हीं महत्वपूर्ण लोकपर्वों में से एक है। कुमाऊं मंडल में इसे “घ्यू त्यार” या घ्यू संक्रात…..तथा गढ़वाल मंडल में ‘घी संक्रांति’ के नाम से जाना जाता है।
डॉ. नेगी ने कहा कि विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में यह पर्व कृषि, पशुपालन और प्रकृति के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन लोग पूजा-पाठ कर अच्छी फसल, पशुधन की समृद्धि एवं परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। घरों में घी से बने विभिन्न पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं तथा परिवार और समाज के साथ मिलकर पर्व की खुशियां साझा की जाती हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए नई पीढ़ी को अपने पारंपरिक त्योहारों, लोक मान्यताओं और रीति-रिवाजों से जोड़ना बेहद आवश्यक है। आधुनिकता के दौर में ऐसे लोकपर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों से जुड़े रहने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।डॉ. राजे नेगी ने कहा कि घी संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य, कृषि, पशुधन और हमारी लोकपरंपराओं के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता का संदेश देने वाला पर्व है। ऐसे पर्व समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करते हैं।
अंत में उन्होंने प्रदेशवासियों को घ्यू त्यार/ घी संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पावन लोकपर्व सभी के जीवन में उत्तम स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि, शांति और खुशहाली लेकर आए तथा उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक निरंतर आगे बढ़ती रहें।उत्तराखंड की लोक मान्यता के अनुसार इस दिन घी खाना जरूरी होता है।
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