ऋषिकेश : एक ओर भारत सरकार की महत्वपूर्ण नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के संरक्षण पर करोड़ों रुपए की धन राशि खर्च करके गंगाजी की अविरलता के प्रयास किए जा रहे हैं। यहां तक कि जब आमजन के मध्य जनजागरुकता के साथ साथ गंगा टास्क फोर्स का गठन किया गया है।बद्रीनाथ धाम लेकर गंगा सागर तक गंगाजी में गिरने वाले दूषित जल जो जलीय जीवो के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं ऐसे नालों को टैपिंग करने और जल मल नदियों में न जाए उसके लिए सिवरेज ट्रीटमेंट प्लांट निर्मित किए जा रहे हैं।वहीं दूसरी ओर ऋषिकेश स्थित वीरभद्र बैराज जलाशय में साहसिक जल क्रीड़ा की शुरुआत के लिए सी प्लेन उतारने का परीक्षण किया जा रहा है। जो कि पर्यावरण संरक्षण के नियमों के बिल्कुल विपरीत है।
डॉ विनोद जुगलन, पर्यावरणविद
अंतर्राष्ट्रीय क्लाइमेट एक्शन लीडरशिप अवार्ड 2025 से न्यूयॉर्क में सम्मानित पर्यावरणविद डॉ विनोद प्रसाद जुगलान का कहना है कि गंगाजी को हमारे वेद पुराणों में मकर वाहिनी कहकर सम्बोधित किया गया है। यहां मगरमच्छ बहुतायत पाए जाते हैं, सी प्लेन के ऐसे परीक्षणों से पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में न केवल बाधा उत्पन्न होगी बल्कि सी प्लेन के संचलन से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ेगा।टेक ऑफ और लैंडिंग के दौरान उत्पन्न तीव्र हलचल से जलीय जीवों, खासकर मगरमच्छ , कछुओं का जीवन चक्र प्रभावित होगा।साथ ही यहां राजाजी नेशनल पार्क के उन वन्य जीवों की दिन चर्या भी प्रभावित होगी जो यहां हर दिन अपनी प्यास बुझाने आते हैं।इससे भी खतरनाक बात यह है कि जब जंगली हाथियों को यहां पानी पीने में दिक्कत होगी तो वह इधर उधर भटकेंगे इससे नीलकंठ महादेव को जाने वाले मार्ग का आवागमन बाधित होने और वन्य जीव मानव संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि होगी।सी प्लेन के ईंजन से होने वाला अत्यधिक शोर जलीय जीवों ही नहीं बल्कि तटवर्ती पशु पक्षियों के लिए हानि कारक होगा। पर्यावरणविद विनोद जुगलान ने कहा कि गंगाजी सिर्फ नदी मात्र ही नहीं हमारी पौराणिक सांस्कृतिक धरोहर है यह विश्वभर के करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है इससे योग और धर्म नगरी ऋषिकेश की धार्मिकता भी प्रभावित होगी हमें पर्यटन की बजाए तीर्थाटन के विकास पर जोर देना चाहिए।तीर्थाटन को साहसिक पर्यटन में बदलने से गंगाजी के प्रति आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं की आस्था भी प्रभावित होगी। स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में तीर्थ नगरी ऋषिकेश और यहां की नदियों का जिक्र आता है इनमें से कई नदियां उपेक्षा के कारण पहले ही अपना स्वरूप खो चुकी हैं।जिनमें रम्भा, चन्द्र भागा और सरस्वती प्रमुख हैं।सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। जंगलों में बढ़ते हुए मानवीय दखल का ही परिणाम है कि वन्यजीव अपना प्राकृतिक सुवास छोड़कर भोजन पानी की तलाश में गांवों गांवों में भटकने लगे हैं।ऐसी परियोजनाओं के क्रियान्वयन और सी प्लेन के संचालन में जल्दबाजी करना ठीक नहीं।सरकार को एक बार पुनर्विचार करना चाहिए।