आज विश्व हाथी दिवस है, क्या कहते हैं पसिद्ध वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार, जानें

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  •  आज विश्व हाथी दिवस है. 
  • 2012 में शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य एशियाई और अफ्रीकी दोनों हाथियों की घटती संख्या और उनकी समस्याओं के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना है. हाथी और इंसान का रिश्ता बहुत पुराना और प्रेम से भरा है
रामनगर : आज विश्व हाथी दिवस है. ऐसे में कॉर्बेट नेशल पार्क में वर्षों से वाइल्ड लाइफ अपने कैमरे में कैद करते आये हैं दीप रजवार. दीप ने न केवल हाथी, बल्कि टाइगर, लेपर्ड व् अन्य जानवरों को अपने कैमरे में कैद किया तस्वीरों के माध्यम से. लोगों को जंगल की क्या जिंदगी होती है. और जंगली जानवरों का क्या भाव, स्वाभाव, रूप, रंग होता है उसको सामने रखा अपने कैमरे के माध्यम से. जिसके लिए बेशुमार  मेहनत,  दिन और रात एक करना पड़ता है तब जाकर रिस्क ले कर एक फोटो मिलती है. उनकी एक फोटो जो टाइगर की थी उसको विषय पटल पर खास जगह मिली थी. दीप ने हाथी दिवस पर अपने वाल पर कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं. उन्हें पंक्तियों के माध्यम से आपको यहाँ  पर रूबरू करवा रहे हैं…..पढ़े आप भी –-सौजन्य तस्वीरें और टेक्स्ट दीप  रजवार के वाल से –
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विश्व हाथी दिवस
आत्ममंथन….१२ अगस्त को संपूर्ण विश्व में ‘विश्व हाथी दिवस’ मनाया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य हाथियों के संरक्षण, उनके गैर-कानूनी शिकार और उनके दाँतों के लिए होने वाली तस्करी को रोकने , उनके कम होते गलियारों को रोकना और उनके और मानव के बीच होने वाले संघर्ष को कम करना है..कॉर्बेट की बात करे तो यहाँ लगभग १३०० हाथियों का बसेरा हैं और ये हाथियों का सबसे बड़ा वास स्थल है. यहाँ के विशाल घास के मैदान इनको आकर्षित करते हैं जो इनकी पसंदीदा चारागाह है परंतु पिछले कुछ सालों से इन घास के मैदानों को ना जलाने के कारण इन घास के मैदानों में इनका पलायन कम हुआ है.पहले फ़रवरी के माह में इन घास के मैदानों को चरणबद्ध तरीक़े से जलाया जाता था और जब मार्च में नयीं कपोलें फूटती तो हाथियों का जमावड़ा होना शुरू हो जाता था और मई जून के महीने में तो पूरे घास के मैदान हाथियों के झुंडों से से पटे रहते थे पर अब गिने चुने ही हाथियों के झुंड दिखायी देते हैं.
मानवीय जनसंख्या बढ़ने के कारण कॉरीडोर्स सालों में सिकुड़ गए जिससे हाथी इंसानी बस्तियों के करीब पहुंच गए.नेपाल के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के हाथी रामनगर, कॉर्बेट और कोसी नदी पहुंचकर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 309 का हिस्सा पार करते हैं, जहां तीन हाथी कॉरीडोर- मलानी-कोटा, चिल्किया-कोटा, दक्षिण पातलीदून-चिल्किया कोटा स्थित हैं।मेरा मानना है कि हाथियों की संख्या, उनकी बेहतरी और प्रबंधन में सबसे बड़ी अड़चन इनका मानवों के साथ होने वाला टकराव ,बंद होते हुए हाथी गलियारे, बेतरतीब खुलते हॉटलस और इनमें देर रात्रि तक बजाया जाने वाला कान फोड़ू संगीत..जिस तेज़ी से कॉर्बेट के आस पास, गांवों और जंगल किनारे धड़ल्ले से होटल्स खुल रहे हैं उससे एन एच 309 और रामनगर – पटकोट मार्ग पर चाहे दिन हो या रात हर समय वाहनों की आवाजाही रहती है जिससे हाथियों को सड़क पार करने में काफ़ी कठिनाई होती है या कहें तो बढ़ते यातायात से इनकी स्वतंत्र आवाजाही बाधित हुई है. इस वजह से इनके व्यवहार में भी परिवर्तन आया है सब ये पहले से ज्यादा आक्रमक हो गए है जो वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं में परिवर्तित हो रहा है..
दूसरा कॉर्बेट एक वेडिंग डेस्टिनेशन हब बन चुका है और नियमों को ताक पर रखकर इन होटलों में खुले में देर रात्रि तक तीव्र आवाज़ में संगीत बजाया जाता है और पट्टाखे फोड़े जाते है जिससे वन्य जीवन डिस्टर्ब हो रहा है और ये चिड़चिड़े हो रहे हैं.विभाग को चाहिए कि ऐसे खत्ते और गाँव जो जंगल से सटे हुए हैं उनसे कुछ दायरे पर जल स्रोतों को बढ़ाने, प्रचुर मात्रा में बांस और रोहनी के पेड़ हाथियों के भोजन के रूप में लगाये ताकि उनका रुख़ आबादी की तरफ़ कम हो ताकि हाथियों के प्राकृतिक आवास मेंसुधार हो और इनके साथ इंसानी टकराव कम हो.इंसान प्रकृति पर नियंत्रण चाहता है जबकि वह सामंजस्य नहीं स्थापित करता यहीं कारण हैं कि हम प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहें हैं कभी बाढ़, सूखा, भूस्खलन, आँधी- तूफान,और कोरोना जैसी महामारी इंसान को निगल रहीं है.केंद्र और राज्य सरकार को वन्यजीवों की रक्षा के लिए और कठोर कदम उठाने चाहिए और समाज के लोगों को भी जंगली जानवरों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा अभियान चला कर समझाना होगा कि जंगल और जानवर हमारे लिए कितने खास हैं इसके साथ पशु- प्रेमियों और अधिकारवादियों के साथ इस तरह की सामाजिक संस्था चलाने वालों को समाज में जागरूकता फैलानी होगी तभी विश्वहाथी दिवस मनाने के असल मायने होंगे.

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