ऋषिकेश : शिरोमणि पंथ अकाली तरणा दल के निहंग प्रमुख जत्थेदार बाबा रणजीत सिंह फूला, संगत व संतों के साथ पधारे परमार्थ निकेतन, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट की

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  •  पर्यावरण संरक्षण, संस्कृति, संस्कार, सामाजिक एकता, सद्भाव और समरसता आदि पर हुई चर्चा
  • प्राचीन जीवन शैली के स्वरूप को परिवारों में वापस लाना होगा–स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश :  परमार्थ निकेतन में शिरामणि पंथ अकाली तरणा दल के निहंग प्रमुख जत्थेदार बाबा रणजीत सिंह फूला  संगत व संतों के साथ पधारे। उन्होंने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट की।मी चिदानन्द सरस्वती  ने पर्यावरण संरक्षण, संस्कृति, संस्कार, सामाजिक एकता, सद्भाव और समरसता आदि पर विस्तृत चर्चा की।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने कहा कि गुरू ग्रंथ साहिब में लिखा है कि ’’पवन गुरू, पाणी पिता, माता धरति महत’’ अर्थात् हवा को गुरू, पानी को पिता और धरती को माता का दर्जा दिया गया है। वर्षों पहले प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति सभी धर्मों ने सचेत कर दिया था। गुरू ग्रंथ साहिब में ंतो स्पष्ट लिखा है। कोई भी धर्म ऐसा नहीं जिसमें प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख न किया गया हो।  गुरु नानक देव जी ने करीब सवा पांच सौ वर्ष पूर्व प्राकृतिक संसाधनों को गुरु, पिता और माता का उदात्त और सर्वाेच्च सम्मानजनक दर्जा प्रदान किया ताकि इन प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान व संरक्षण जैसे हम अपने माता, पिता और गुरू का करते हैं वैसे ही करना होगा तभी हम इन्हें संरक्षित रख सकते हैं। स्वामी जी ने कहा कि हमारे महापुरूषों और ऋषियों ने भी ‘अतीत में लौटें’ का संदेश दिया है अर्थात पारम्परिक जीवन शैली अपनाने हेतु प्रेरित किया है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने मिशन लाइफ ‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ को अपनाये का आह्वान पूरी दुनिया से किया है। अथर्व वेद में भी भौगोलिक शांति के लिए मानव और सृष्टि के सभी अंगों के बीच समन्वय स्थापित करने का संदेश दिया है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने कहा कि वर्तमान समय में विशेष कर युवा पीढ़ी को संस्कारों से पोषित करने की जरूरत है। भारतीय सभ्यता में धर्म, संस्कार, पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज एवं परंपराओं का अद्भुत समन्वय है। भारत में प्राचीनकाल से ही संस्कृति, संस्कार और जीवन पद्धति, आध्यात्मिक रही है। भारतीय संस्कार, रीति-रिवाज और परंपराएँ हमारे जीवनशैली का महत्वपूर्ण अंग हैं। भारतीय संस्कृति सभी को  समाहित करने और  सामंजस्य स्थापित करने  की संस्कृति है। इसमें सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता का अद्भुत सामंजस्य है। यह संस्कृति नैतिकता से युक्त और वसुधैव कुटुंबकम् के भाव से ओत-प्रोत है।प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति प्रकृति की उपासक रही है परन्तु वर्तमान समय में परिवारों से संस्कार खोते दिखायी दे रहे हैं; आपसी विश्वास, व्यवहार में मानवता और स्वभाव में नैतिकता की कमी दिखायी दे रही है इसलिये आपसी सामन्जस्य, समरसता का वातावरण और आपसी सद्भाव अत्यंत आवश्यक है। आपस में मिलकर रहंे तथा आपसी एकता और सामन्जस्य को कैसे बनाये रखें इसलिये हमें प्राचीन जीवन शैली के स्वरूप को परिवारों में वापस लाना होगा।
शिरोमणि पंथ अकाली तरणा दल के निहंग प्रमुख जत्थेदार बाबा रणजीत सिंह फूला जी ने संगत व संतांे के साथ परमार्थ निकेतन की विश्व विख्यात गंगा आरती में सहभाग किया तथा इस पवित्र वातावरण में दो दिनों तक विश्राम कर यहां पर होने वाली विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियों में सहभाग किया। स्वामी ने आशीर्वाद स्वरूप रूद्राक्ष का दिव्य पौधा भेंट किया।
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