(लेख) भारतीयता की वैचारिक लड़ाई और धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की राजनीति

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पार्थसारथि थपलियाल (लेखक):-
भारतीय शिक्षा व्यवस्था केवल परीक्षा, डिग्री और रोजगार का माध्यम नहीं है। वह यह भी तय करती है कि आने वाली पीढ़ियाँ अपने देश, समाज, संस्कृति और इतिहास को किस दृष्टि से देखेंगी। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय ज्ञान-परंपरा, भारतीय भाषाओं, प्राचीन शिक्षा-पद्धति और सांस्कृतिक विरासत को शिक्षा के मुख्य प्रवाह में अधिक स्थान देने की कोशिश हुई है। शिक्षा मंत्रालय भारतीय ज्ञान-प्रणाली को पाठ्यक्रम में समाहित करने को राष्ट्रीय शिक्षा नीति का महत्वपूर्ण अंग मानता है। शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान, जिन्हें एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत नीट पेपर लीक मामले में अराजकता का माहौल बनाकर त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया गया, उसी प्रकार की स्थिति में न पंजाब के मुख्यमंत्री से त्यागपत्र मांगा गया न झारखंड में मुख्यमंत्री से।

नीट पेपर लीक मामले में अमेरिका से आये तिलचट्टा लोग जो अराजक आंदोलन में केजरीवाल की नीतियों के समर्थक रहे उसमें विदेशी फंडिंग के सहयोग से राजनीतिक स्वरूप दिया गया। आखिर ऐसा क्यों किया गया? इसी पृष्ठभूमि में धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यकाल को देखना चाहिए। उनके कार्यकाल में NCERT की नई पुस्तकों में भारतीय ज्ञान-परंपराओं और देशज ज्ञान को समाहित करने की दिशा में संस्थागत प्रयास हुए हैं। NCERT के अनुसार नई पाठ्यपुस्तकों में भारतीय ज्ञान-प्रणालियों, जनजातीय ज्ञान तथा पारंपरिक ज्ञान-पद्धतियों को विभिन्न विषयों में शामिल किया गया है। यह परिवर्तन केवल पाठ्यपुस्तक का परिवर्तन नहीं है, यह उस दृष्टिकोण में बदलाव का संकेत है जिसमें भारत के अतीत को केवल औपनिवेशिक या पश्चिमी दृष्टि से देखने के बजाय भारतीय स्रोतों और अनुभवों को भी महत्त्व दिया जा रहा है। इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में पुरानी वैचारिक धारणाओं और नई इतिहास-दृष्टि के बीच संघर्ष स्वाभाविक है। भारतीय इतिहासलेखन में मार्क्सवादी इतिहासकारों का प्रभाव लंबे समय तक अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में रोमिला थापर, इरफान हबीब, आर. एस. शर्मा और बिपिन चंद्र जैसे इतिहासकारों को मार्क्सवादी इतिहासलेखन की परंपरा के प्रमुख प्रतिनिधियों के रूप में पढ़ाया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि उनके समस्त शोध को असत्य अथवा बेईमानी कह दिया जाए, लेकिन जब हम भारत के गौरवमय इतिहास को जानना चाहते हैं उसमें भारतीयता का अभाव है। हमे भारत के गौरव की जगह मुगलों की महानता पढ़ाई गई। भारत के सांस्कृतिक वैभव का कहीं उल्लेखनीय इतिहास नहीं लिखा गया। सिख गुरुओं के बलिदान को संदर्भो में निबटा दिया गया। चित्तौड़ के शौर्य को केवल रानी पद्मिनी की सौंदर्य के लिए युद्ध के रूप में पढ़ाया गया। छत्रपति शिवाजी महाराज, शंभा जी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान, गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों के बलिदान की कहानी, भाई मति दास, सती दास, भाई परमानंद, को इतिहास में क्या स्थान मिला। भारतीय स्थापत्य को इतिहासकारों ने वह महत्व नहीं दिया, जो मिलना चाहिए था।भारत को सर्वधर्म समभाव की दृष्टि रखता है उसे जातीयता के रूप में इतिहासकारों ने लिखा। परंतु यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या इतिहास-लेखन में किसी एक विचारधारा का अत्यधिक प्रभुत्व दूसरे स्रोतों, दृष्टियों और राष्ट्रीय अनुभवों को पर्याप्त स्थान देता रहा? यही वह प्रश्न है जिस पर आज गंभीर पुनर्विचार आवश्यक है।
रोमिला थापर स्वयं इतिहास और विचारधारा के संबंध को स्वीकार करती रही हैं और उन्होंने इतिहास के राजनीतिक उपयोग पर बहस की है। इसलिए भारतीय इतिहास पर बहस को “एक पक्ष सत्य और दूसरा पक्ष झूठ” की सरल श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की मांगों को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। हाल के वर्षों में परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, NTA और विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर उनके इस्तीफे की मांग उठी है। लोकतंत्र में ऐसी मांग विपक्ष और नागरिक समाज का वैध अधिकार है। लेकिन जब आंदोलन के साथ आंदोलन जीवी जुड़ जाते हैं तब हर भारतीय को यह समझने की आवश्यकता है कि अमेरिकन डीप स्टेट क्या क्या हथकंडे अपना सकता है। हाँ, यह जांच का विषय अवश्य है कि शिक्षा क्षेत्र में पाठ्यपुस्तकों, प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग व्यवस्था से जुड़े आर्थिक हित कहीं नीति-निर्माण और जनमत को प्रभावित तो नहीं करते। शिक्षा का व्यापारीकरण एक गंभीर प्रश्न है और उसका समाधान पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच तथा संस्थागत सुधार से ही संभव है.
भारत को न तो वामपंथी इतिहासलेखन के एकाधिकार की आवश्यकता है और न किसी राजनीतिक विचारधारा के अधीन इतिहास लिखने की। आवश्यकता है ऐसे इतिहास की जो भारत की उपलब्धियों पर गर्व करे, उसकी कमजोरियों को भी स्वीकार करे और प्रमाणों के आधार पर अतीत का पुनर्मूल्यांकन करे। धर्मेंद्र प्रधान के प्रयासों का वास्तविक मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए। इतिहास किसी दल की संपत्ति नहीं है। वह पूरे राष्ट्र की सामूहिक स्मृति है। इसलिए भारत के इतिहास को वैचारिक खांचों से मुक्त कर बहुविध भारतीय स्रोतों, भारतीय दृष्टि और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति के समन्वय से पुनर्पाठ करना ही शिक्षा के भारतीयकरण का सार्थक मार्ग हो सकता है। धर्मेंद्र प्रधान शिक्षामंत्री के रूप में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को भी बढ़ा रहे थे, यही उनके विरुद्ध गया, नीट परीक्षा को तो बहाना बनाया गया। नोट- लेखक के निजी विचार हैं



