(लेख) अधिकारी को मिला बंगाल का अधिकार
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पार्थसारथि थपलियाल डेढ़ दशक तक पश्चिम बंगाल की राजनीति के क्षितिज पर मंडराने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पराभव मतदाताओं में ख़ामोशी के साथ कर दिया। खुद की उपजे नहीं और ब्रह्मा की मानें नहीं, कहावत को चरितार्थ करने वाली प. बंगाल की की, अब भूतपूर्व हो चुकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बंगाल विधानसभा के चुनावों में बुरी तरह पराजित होने के बाद इस जिद्द पर अड़ी रही कि मैं त्यागपत्र नहीं दूंगी। यहां उन्होंने रस्सी जल गई पर ऐंठ न गई चरितार्थ कर दी। राज्य के राज्यपाल 7 मई को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होते ही पिछली विधानसभा भंग कर दी। उनके शासन की यह शैली पिछले डेढ़ दशक से चल रही थी। उन्होंने स्वयं को संघर्षशील जननेता, बंगाल की अस्मिता की प्रतीक और वामपंथ के विकल्प के रूप में स्थापित किया। किंतु समय के साथ उनकी राजनीति पर परिवारवाद, प्रशासनिक केंद्रीकरण और विशेष समुदायों के तुष्टिकरण के आरोप भी बढ़ते गए। इसी राजनीतिक वातावरण में सुवेंदु अधिकारी का उदय केवल एक नेता का उदय नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में वैचारिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बन गया है। ममता के शासन काल में तुष्टीकरण की राजनीति को अवांछित महत्व मिला। कट मनी और तोलाबाजी टीएमसी कार्यकर्ताओं की आय का साधन था। मारकाट और आगजनी की घटनाएं साधारण सी बात थी। सनातनियों के साथ भेदभाव नें प्रभावित पक्ष के खामोश मतदाताओं में पर. बंगाल का भगवाकरण करने का मन बना लिया था। 

एक समय था जब सुवेंदु अधिकारी, ममता बनर्जी के सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में गिने जाते थे। नंदीग्राम आंदोलन से लेकर तृणमूल कांग्रेस के विस्तार तक उनकी भूमिका निर्णायक रही। किंतु राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, संगठनात्मक असंतोष और वैचारिक मतभेदों ने उन्हें भाजपा के साथ ला खड़ा किया। 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम की लड़ाई केवल दो नेताओं की लड़ाई नहीं थी, बल्कि बंगाल की राजनीतिक दिशा तय करने वाला संघर्ष बन गई। सुवेंदु अधिकारी की विजय ने यह संकेत दिया कि बंगाल में भाजपा केवल बाहरी शक्ति नहीं रही, बल्कि वह स्थानीय नेतृत्व भी तैयार कर चुकी है।ममता बनर्जी की राजनीति पर सबसे गंभीर आरोप तुष्टिकरण की नीति को लेकर लगता रहा है। भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप है कि राज्य सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति नरम रुख अपनाकर वोट बैंक की राजनीति को प्राथमिकता दी। सीमावर्ती जिलों में जनसंख्या संतुलन, फर्जी दस्तावेजों और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों को भाजपा ने लगातार उठाया है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति बताती रही है। सच्चाई यह है कि बंगाल की राजनीति में पहचान और सुरक्षा का प्रश्न अब केंद्रीय मुद्दा बन चुका है। भाजपा ने घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर प्रस्तुत किया, जबकि तृणमूल ने इसे मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया।
सुवेंदु अधिकारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बंगाल की जमीन से जुड़े नेता हैं। वे केवल वैचारिक भाषण नहीं देते, बल्कि स्थानीय सामाजिक समीकरणों और ग्रामीण राजनीति की गहरी समझ रखते हैं। भाजपा को बंगाल में लंबे समय तक जिस स्थानीय चेहरे की आवश्यकता थी, वह सुवेंदु अधिकारी के रूप में मिला। उनकी राजनीतिक भाषा में बंगाल का स्वाभिमान भी है और हिंदुत्व का स्पष्ट आग्रह भी। यही कारण है कि वे भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए संघर्ष के प्रतीक बन गए हैं।हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने सुवेंदु अधिकारी को जिस प्रकार महत्व दिया गया है, उससे स्पष्ट है कि भाजपा उन्हें बंगाल की राजनीति में दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखती है। भाजपा की बंगाल विजय की संभावनाओं का विश्लेषण करें तो स्पष्ट दिखता है कि पार्टी ने राज्य में मजबूत आधार बना लिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव ने यह सिद्ध किया कि बंगाल अब एकदलीय राजनीति का प्रदेश नहीं रहा। हिंदू मतों का ध्रुवीकरण, युवाओं में परिवर्तन की आकांक्षा, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी तृणमूल सरकार तथा केंद्रीय योजनाओं के प्रभाव ने भाजपा को नई ऊर्जा दी है।हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। ममता बनर्जी अब इंडी गठबंधन के माध्यम से केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक संकट पैदा करती रहेगी।बंगाल का अधिकार सुवेंदु अधिकारी को मिलने के बाद जनआकांक्षाएं बढ़ गई हैं। हिंदुत्व के साथ साथ बंगाल की भाषा, साहित्य, संस्कृति और आर्थिक उम्मीदों को भी अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना होगा। सुवेंदु अधिकारी इस भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे बंगाल की राजनीतिक मनोवृत्ति को समझते हैं।
आज बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर ममता बनर्जी का संघर्ष व सादगीभरा लोकजीवन है और दूसरी ओर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा का उभरता आत्मविश्वास। आने वाले वर्षों में यह संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि बंगाल की राजनीति पहचान, विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
संभव है कि भविष्य का इतिहास बंगाल की राजनीति को ममता युग और अधिकारी युग के संक्रमणकाल के रूप में याद करे। Note : लेखक आकाशवाणी से सेवानिवृत हैं और उनके ये अपनी विचार हैं

