दिल्ली : केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, में ‘वैशेषिककोशः’ ग्रन्थ का भव्य लोकार्पण, प्रख्यात विदुषी प्रो. शशिप्रभा कुमार का अभिनन्दन समारोह

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  • महर्षि कणाद की ज्ञान-दृष्टि ने हजारों वर्ष पूर्व ही परमाणु, पदार्थ और सृष्टि के सूक्ष्मतम रहस्यों का किया था गहन विश्लेषण
  • भारतीय दर्शन में विज्ञान, तर्क, अनुसंधान और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय; प्राचीन ज्ञान परम्परा को आधुनिक शोध एवं वैश्विक विमर्श से जोड़ने का आह्वान
  • “वैशेषिक दर्शन भारत की प्राचीन वैज्ञानिक चेतना और ऋषियों की अद्भुत तत्त्वदृष्टि का प्रतीक है।”— परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती
नई दिल्ली में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित ‘वैशेषिककोशः’ ग्रन्थ के लोकार्पण एवं प्रख्यात विदुषी प्रो. शशिप्रभा कुमार जी के अभिनन्दन समारोह में परमार्थ पीठाधीश्वर, परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य एवं प्रेरणादायी उद्बोधन प्राप्त हुआ।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की ऋषि परम्परा ने हजारों वर्ष पूर्व ही परमाणु से लेकर परमात्मा तक, पदार्थ से लेकर चेतना तक और प्रकृति से लेकर सृष्टि के मूल रहस्यों तक गहन चिंतन किया। महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन इसका अद्भुत प्रमाण है। भारतीय ऋषि केवल आध्यात्मिक अनुभूति के साधक ही नहीं, बल्कि तर्क, प्रमाण, विश्लेषण और वैज्ञानिक अनुसंधान के भी महान उपासक थे।
उन्होंने कहा कि विज्ञान सृष्टि के स्वरूप और उसकी कार्यप्रणाली को समझता है, जबकि अध्यात्म अस्तित्व के मूल आधार और चेतना का बोध कराता है। भारतीय ज्ञान परम्परा की विशेषता है कि यहाँ विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि सत्य की खोज के पूरक मार्ग हैं।पूज्य स्वामी जी ने संस्कृत को भारत की ज्ञान-संपदा की संवाहिका बताते हुए कहा कि वेद, उपनिषद, दर्शन, आयुर्वेद, गणित और खगोल विज्ञान सहित ज्ञान की असंख्य धाराएँ संस्कृत वाङ्मय में सुरक्षित हैं। आवश्यकता है कि इस अमूल्य विरासत को आधुनिक शोध, अनुवाद और वैश्विक विमर्श के माध्यम से नई पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए।
इस अवसर पर प्रो. शशिप्रभा कुमार जी, प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय जी, प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी जी सहित अनेक विद्वानों, शिक्षाविदों, कुलपतियों एवं आचार्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही।परमार्थ निकेतन का संदेश है कि अपनी ऋषि परम्परा के ज्ञान को जानें, समझें, आत्मसात करें और विश्व कल्याण के लिए आगे बढ़ाएँ, क्योंकि जिस भारत ने परमाणु से परमात्मा तक चिंतन किया, उस भारत की ज्ञान-ज्योति सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करने की क्षमता रखती है।
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