(लेख) संस्कृति : बसंतोत्सव (5) परंपरा : तन रंग लो जी मन रंग लो – दुल्हेंडी

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संस्कृति : बसंतोत्सव (5)
परंपरा : तन रंग लो जी मन रंग लो – दुल्हेंडी
            ~पार्थसारथि थपलियाल~
आज बिरज में होरी रे रसिया, आज बिरज में होरी रे रसिया….
कौन के हाथ कनक पिचकारी, 
कौन के हाथ कमोरी रे रसिया।
कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी,
राधा के हाथ कमोरी रे रसिया।
होली के दिनों में यह गीत होली का एक प्रतीक गीत बन जाता है।होलिका दहन की अगली सुबह बहुत मस्तीभरी होती है जब लोग अपने हाथों में अबीर, गुलाल, बाल्टियां भर भर कर रंगभरी पिचकारी के साथ होली। खेलने निकलते हैं।सच कहूँ-जिसमें लचक है उसीमें जान है,अकड़ खास मुर्दे की पहचान है। कई बार मुझे लगता है सामूहिकता आदमी के यांत्रिक व्यवहार को तोड़ती है। यह सामाजिक रैगिंग भी है। इन होली की टोलियों में जुड़कर भारतीयता के वे गुण दिखाई देते है जो अक्सर शालीनता की चादर से ढके रहते हैं। होली में मानव व्यवहार के 9 रस हमारे सामने आ जाते हैं। बूढ़े से बूढ़ा और जवान से जवान, होली की खुली प्रसन्नता में झूमने लगते हैं। एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाना, हंसी मजाक करना, नाचना गाना और क्या नही? कुछ लोग होते हैं जो होली के रंगों से डरते हैं या अभिजात्य बने रहना पसंद करते हैं, वे होली के इस आनंद को समझे बिना ही दुनिया से जाएंगे।
होली सामाजिक समरसता स्थापित करती है। जिन लोगों में मॉन मुटाव होता है वे भी होली के दिन दिलों की दूरी रंगों में बदरंगी बनकर धो डालते हैं। होली जैसे त्यौहार हमे हमारी संस्कृति को जोड़े रखने के लिए मजबूर करते हैं। अगर हमारे तीज त्यौहार भी हमारे नही रहे तो हमारी राष्ट्रीय एकता के सूत्र भी खत्म हो जाएंगे। जुड़ने की पहल प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं करनी चाहिए। एक बार आप किसी से जुड़ते हैं तो आपको अनुभव होता है कि इस आदमी के बारे में मेरी सोच सही नही थी। हमारी सनातन संस्कृति तोड़ती नही बल्कि जोड़ती है। आइए रंगों की होली के विभिन्न रंगों में हम भ रंग जाएं।
ब्रज की होली- श्रीकृष्ण जन्म भूमि मथुरा, बरसाना, नंदगांव ये वे प्रमुख होली तीर्थ हैं जहां की होली देखने दुनियाभर से लोग आते हैं-
होली खेलत नंदलाल बिरज में, होली खेलत नंद लाल
ग्वाल बाल संग रास रचाये नटखट नंद गोपाल…
बरसाना और नंदगांव की लठ्ठमार होली का आनंद ही अलग है। भारत की आधुनिक नारियों को होली अवश्य देखनी चाहिए जिनको यह लगता है कि नारी स्वतंत्र नही है, होली में पुरुषवर्ग विशेषकर देवर भाभी के मध्य बचाव का संघर्ष देखने लायक होता है। ननद-भौजाई, समधी-समधन, जीजा-साला एक उल्लास के साथ एकदूसरे पर रंग लगाते हैं रंग- बदरंग करने की कोशिश करते हैं। इस परंपरा के पीछे एक तो प्रह्लाद के जीवित रहने की खुशियाँ हैं, श्रीकृष्ण और राधा के मध्य रंग बरसाना और बचाव करना भी जुड़ा है। शुरुआत वृंदावन और बरसाना की गोपियों और सखियों के मध्य लठमार होली से होता है। बाद में निर्धारित तिथि को नंदगांव से श्रीकृष्ण और उनके सखा बरसाना होरी खेलने आते हैं । उससे दिन लड्डू गोपाल के बाद बरसने वालों को नंदगांव में होली खेलने आमंत्रित किया जाता है। यह आयोजन पूर्णिमा से पहले निर्धारित दिनों में किया जाता है। होली दहन के बाद अगले दिन को बड़ी होली कहा जाता है। इस दिन देश के अनेक भागों में और भी विविधता देखने को मिलती हैं। कहीं खड़ी होली खेली जाती है कहीं बैठकी होली।
इस विषय में जानकारी के लिए पढ़ें अगला अंक…..2…

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