UK :चुनरी महामहोत्सव…परमार्थ निकेतन में मां गंगा को अर्पित की चुनरी स्वामी चिदानन्द सरस्वती और रमेशभाई ओझा ने

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- पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती और पूज्य रमेशभाई ओझा ने भक्तों के साथ अर्पित की चुनरी
- मां गंगा की पूजा अर्चना कर चुनरी अर्पित कर राष्ट्र की समृद्धि हेतु की प्रार्थना
- हिंदुआ सूर्य वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की पावन जयंती पर नमन
- गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर कोटि-कोटि नमन
ऋषिकेश : परमार्थ निकेतन में माँ गंगा को चुनरी अर्पित कर “चुनरी महामहोत्सव” अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। इस पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं पूज्य रमेशभाई ओझा ने देश-विदेश से आये भक्तों के साथ माँ गंगा की विधिवत पूजा-अर्चना कर चुनरी अर्पित की तथा राष्ट्र की समृद्धि, विश्व शांति और मानवता के कल्याण हेतु प्रार्थना की।परमार्थ निकेतन, गंगा तट पर वैदिक मंत्रोच्चारण व शंख ध्वनि के बीच माँ गंगा को चुनरी अर्पित की। चुनरी माँ शक्ति, मातृत्व और शक्ति के सम्मान का प्रतीक है। माँ गंगा को चुनरी अर्पित कर समस्त सृष्टि के समृद्धि की प्रार्थना की।भारत की पावन भूमि ने ऐसे महान विभूतियों को जन्म दिया, जिन्होंने राष्ट्र की आत्मा को अपने विचारों, साहस और संस्कारों से आलोकित किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने अमर गीत जन गण मन द्वारा देश की एकता और राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया और महाराणा प्रताप ने स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। एक ने कलम से राष्ट्रभाव जगाया, तो दूसरे ने तलवार से स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा की। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि माँ गंगा, भारत की आध्यात्मिक चेतना की जीवनरेखा हैं। गंगा हमारी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की संवाहिका हैं। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है गंगा संरक्षण की, उनकी निर्मलता, अविरलता और पवित्रता को बनाए रखने हेतु स्वयं को समर्पित करने की। चुनरी महोत्सव समाज में प्रेम, एकता, सेवा और संस्कारों की ज्योति प्रज्वलित करता है। यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।
रमेशभाई ओझा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नदियों को माता कहा गया है क्योंकि वे बिना किसी भेदभाव के सभी को जीवन प्रदान करती हैं। गंगा को चुनरी अर्पित करना हमारी उस सनातन भावना का प्रतीक है जिसमें प्रकृति को पूजनीय माना गया है। उन्होंने कहा कि जहाँ आधुनिकता हमें उपभोग की ओर ले जाती है, वहीं सनातन संस्कृति हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का संदेश देती है।परमार्थ निकेतन द्वारा आयोजित चुनरी महामहोत्सव सनातन संस्कृति की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जिसमें श्रद्धा के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण, राष्ट्र समृद्धि और विश्व कल्याण का संदेश समाहित है। माँ गंगा के चरणों में अर्पित यह चुनरी सम्पूर्ण मानवता के लिये प्रेम, करुणा, शांति और संरक्षण का दिव्य संदेश है।


