सत्यप्रकाश थपलियाल : एक विनम्र श्रद्धांजलि! गढ़वाल के निर्बलों की उम्मीद का एक द्वार बंद हो गया

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शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सत्य प्रकाश थपलियाल की लंबी बीमारी के बाद अपनी बैकुंठ धाम की यात्रा पर चले गए। 24 जुलाई 2026 को रात साढ़े दस बजे सफदरजंग हॉस्पिटल में उपचार के दौरान हृदयगति अवरोध के कारण उनका निधन हो गया। शनिवार, 25 जुलाई को सोशल मीडिया में उनके निधन का दुर्भाग्यपूर्ण समाचार पढ़ने में आया। उनके साथ बिताए पल एक फिल्मी रील की तरह चलती दिखाई दिए। वे काफी समय से अपनी संस्कारी बेटी चन्द्रिका जोशी और दामाद (भारत सरकार में वरिष्ठ वैज्ञानिक) आर.के.जोशी के पास दिल्ली में स्वास्थ्य लाभ के लिए ठहरे हुए थे। मैं दो बार उनके हाल जानने के लिए जोशी के आवास पर गया था। पिछले तीन माह से उनसे बात नहीं हो पा रही थी।
सत्य प्रकाश थपलियाल के बिना आज कोटद्वार मौन है। कोटद्वार के वर्तमान समाज में वे सर्वाधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों में प्रतिनिधि थे। वे उन लोगों के सहारा और उम्मीद थे, जिनका कोई नहीं था। उत्तराखंड साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच के वे संस्थापक थे। इस मंच के माध्यम से साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियां तो आयोजित होती ही थी, इनके अलावा वे गरीब और अनाथ बच्चों के लिए आर्थिक सहायता भी देते थे। इस सहायता में वे अनेक आर्थिक सम्पन्न लोगों का सहयोग लेते थे। एक साल में सौ से अधिक बच्चों के आर्थिक संबल के लिए वे सहायता जुटाते थे। सत्य प्रकाश थपलियाल सन 2005 से 2019 तक श्री ज्वालपा देवी मंदिर समिति द्वारा संचालित ज्वालपा धाम संस्कृत विद्यालय के प्रबंधक रहे। एक बार जब मैने उनसे जानने की कोशिश की कि ज्वालपा धाम संस्कृत विद्यालय में बच्चों के लिए उन्होंने निशुल्क भोजन व्यवस्था कैसे शुरू की? बड़े आग्रह के बाद बताने को तैयार हुए। उन्होंने बताया कि एक बार वे सपत्नीक ज्वालपा धाम गए हुए थे। संभवतः ये बात सितंबर 2011 की थी। अध्यापक एक छोटे से बच्चे (विद्यार्थी) को डांट रहा था।
तुमने भोजनालय का शुल्क जमा नहीं किया मैं तुम्हें विद्यालय से निकाल दूंगा…. वापसी में थपलियाल की धर्मपत्नी कृष्णा (जो स्वयं अध्यापिका थी) ने उन्हे खरी खोटी सुना दी। कैसे प्रबंधक हो आप? एक गरीब बच्चे को डांटते हुए सुनते रहे!… कोटद्वार पहुंचते ही उन्होंने जौनपुर के एम.पी. थपलियाल को बुलाया और पूरा घटनाक्रम सुनाया। एम.पी. थपलियाल ने रुपए 20,000 का चेक सत्यप्रकाश को सौंपा। चेक बैंक खाते में जमा हुआ और उन्होंने कहा अब कोई विद्यार्थी भोजनालय शुल्क नहीं देगा। यह राशि 2 माह चल पायी। अब समस्या अगले महीने की थी। उन्होंने पचास हजार रूपए अपने बैंक से निकाले और समिति को दे दिए। इस बीच माता मंगला से कोटद्वार में उनका संपर्क हुआ अगले माह (संभवतः फरवरी 2012) ज्वालपा धाम में माता मंगला के हंस फाउंडेशन की ओर से बड़ा आयोजन किया गया जिसमें 3000 से अधिक कम्बल, स्वेटर आदि जरूरत मंदों को बांटे गए। सत्यप्रकाश ने श्री ज्वालपा देवी मंदिर समिति के भोजनालय की दास्तां कह दी। उसी दिन से ज्वालपा धाम संस्कृत विद्यालय के छात्रों की सुव्यवस्थित भोजन व्यवस्था शुरू हुई जो आज तक चल रही है। हंस फाउंडेशन के सहयोग से मंदिर तक छायापथ का निर्माण में भी सत्यप्रकाश की भूमिका रही।
अपने उत्तराखंड साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच के अंतर्गत उन्होंने अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिभावान अग्रणीय लोगों का सम्मान भी किया। पौड़ी गढ़वाल में कल्जीखाल ब्लॉक के अंतर्गत चिलौली गांव में 1936 में सत्यप्रकाश थपलियाल का जन्म हुआ था। (सरकारी रिकॉर्ड में 3 मई 1940) उनके पिता “विश्वदर्शन” पुस्तक के लेखक महात्मा रामरत्न थपलियाल थे। उनकी पत्नी का निधन पहले ही हो चुका है। उनके पुत्र विवेक थपलियाल और उनका सहायक रवि डबराल सदैव सेवा में रहे। सत्यप्रकाश ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अध्यापक के रूप में बहुत ख्याति अर्जित की थी। वे 1972 में राजकीय सेवा में शिक्षक के रूप में आए और 1998 में सेवा निवृत्त हुए। प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्ति के बाद वे पूर्ण रूप से जनसेवा में लग गए। सत्यप्रकाश स्वामी विवेकानंद, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण के जीवन से प्रभावित थे। इसलिए सेवा ही मानव धर्म है को उन्होंने अपना ध्येय बनाया।
सत्यप्रकाश थपलियाल पार्थिव शरीर परिजनों और उनके चाहनेवालों के अंतिम दर्शनों के लिए कोटद्वार ले जाया गया है। पार्थिव देह कोटद्वार में पहुंचते ही शोकमग्न कोटद्वार में सिसकते स्वर और आंखों से अश्रु धारा ही पूरे शहर के भाव व्यक्त कर रही थी। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 26 जुलाई को हरिद्वार में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। सच में उनके निधन से निर्बल लोगों की उम्मीदों का एक दरवाजा आज बंद हो गया।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को वैकुण्ठ लोक में स्थान दें। ॐ शांति। शांति। शांति। नमन।।
बड़े गौर से सुन रहा था जमाना
तुम्ही सो गए दास्ताँ कहते कहते।।
निवेदक- पार्थसारथि थपलियाल



