ऋषिकेश : पहली बार मना और देखा जिंदगी में यहाँ पर लोगों ने गणतंत्र दिवस मनाना, ‘वाइज ब्रिज ट्रस्ट’ पहुंचा इन लोगों के पास, फहराया तिरंगा

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मनोज रौतेला की रिपोर्ट-
ऋषिकेश : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और हर नगरी हरिद्वार से कुछ मुश्किल से 15-20 किलोमीटर की दूरी पर है एक जगह. इन जंगलों से शिक्षा की रोशनी निकल रही है आजकल. श्यामपुर फिर चिड़ियापुर है यहाँ पर जंगलों में रहते हैं गुज्जर. मुख्य मार्ग से लगभग 3 किलोमीटर अंदर, उबड़-खाबड़ रास्ता है. कार जाना संभव नहीं है. जीप जा सकती है. जीप की भी स्थित ऐसी है एक टायर जमीन पर तो दूसरी तरफ का टायर हवा में होगा.हिचकोले खाते हुए गुज्जर बस्ती में पहुंचा जा सकता है. अगर कहीं पलट गयी जीप तो कोई बड़ी बात नहीं. फिर अंदाजा लगा सकते हैं क्या होगा…उसके बड़ी विकट समस्या,  यहाँ पर इंसान टाइगर को नहीं बल्कि टाइगर इंसान को देख रहा होता है, इसलिए निवाला बनने में कुछ मिनट लग सकते हैं इंसान को लेपर्ड/टाइगर का. दोनों एक दूसरे को स्माइल कर रही होंगी या फिर मातम…फिर सबसे खतरनाक गजराज महाराज यानी हाथी. जब चाहे मस्त चाल में वे दल के साथ या अकेले रास्ते में टकरा जाते हैं. फिर तो उनके मूड की बात है और आपकी किस्मत…बाएं और दाएं घना जंगल सिर्फ. इस बस्ती में लगभग 50 परिवार रहते हैं जो वर्षों से रहते हैं. लेकिन बिडंबना देखिये इन्होंने कभी गणतंत्र दिवस मनाया ही नहीं.न इनको पता था ज्यादा कुछ. इनके बच्चे तो फिर बच्चे हुए.. कारण शिक्षित न हो पाना. खैर, गुरूवार को 26 जनवरी के दिन ऋषिकेश बेस्ड “वाइज ब्रिज ट्रस्ट” यहाँ पहुंचा. इसके अध्यक्ष हैं भुवनेश्वर प्रसाद भारद्वाज उर्फ़ भास्कर. गणतंत्र दिवस कैसे और क्योँ मनाया जाता है इनको कुछ खास पता नहीं था. लेकिन आज 26 जनवरी 2023 को इनको पता लगा. ऐसा भी होता है. इसलिए मनाया जाता है और भारत का सबसे बड़े रास्ट्रीय पर्वों में से एक है यह.

यहाँ तिरंगा फहराया गया.राष्ट्रगान हुआ.वन्दे मातरम के नारे लगे. मिष्ठान वितरण हुआ और कुछ नन्ने बच्चों ने शानदार कार्यक्रम की तैयारी कर रखी थी वे प्रस्तुत हुए. मतलब जंगल में मंगल नन्हे मुन्नों के संग. शिक्षा, ज्ञान के स्वर सुनाई दे रहे थे बीच जंगल में. चारों तरफ चिड़ियों की चहचाहाट के बीच ज्ञान की बातें हो रही थी. गुज्जर बस्ती के लगभग 60 -70 बच्चों के आँखों में एक उम्मीद दिख रही थी जिज्ञासा इस जंगल में चिड़िया, पेड़, पौधों, जंगली जानवरों, गाय भैंस और अपने परिवार (गुज्जर समुदाय) के बीच आज यह क्या हो रहा है. यहाँ इन बच्चों को तालीम देने की जिम्मेदारी दे रखी थी ट्रस्ट ने शिक्षक सुलेमान लोधा, नगमा प्रवीण और मोहम्मद मुस्तफा को. जो खुद गुज्जर समुदाय के हैं और दूसरे बस्ती में रहते हैं यहाँ रोज पढ़ाने आते हैं बच्चों को. इनमें से सुलेमान और नगमा दोनों बीएससी के विद्यार्थी हैं. खुद भी तालीम हासिल कर रहे हैं और अब गुज्जर समुदाय के बच्चों को भी तालीम दे रहे हैं. टूर्स के अध्यक्ष भास्कर ने बताया इनको बाकायदा सैलरी दी जाती है ट्रस्ट के द्वारा. लगातार इनको फॉलो किया जाता है क्या कर रहे हैं, कितना प्रोग्रेस हो चुकी है बच्चों में. जहाँ कहीं हो सके दूसरे लोकेशन से ऑनलाइन अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए कक्षा भी ली जाती है. मुस्तफा खुद १२वीं कक्षा का छात्र है और वकील बनना चाहता है. गुज्जर समुदाय यहाँ पर आस पास आज तक कोई वकील नहीं बन पाया है ऐसा उसका कहना है. नगमा बीएससी कर रही है लेकिन उससे मेडिकल फील्ड में जाना है, नर्स बनना है. उसके लिए पढ़ाई के साथ जद्दोजहद करने में लगी हुई है. पिता का समर्थन है. रोज पिता दूसरे बस्ती से यहाँ पढ़ाने के लिए उसे लाते हैं और ले जाते हैं. लेकिन यहाँ तक पहुंचना उसके लिए और उसके समुदाय के लिए अचम्भे वाली बात है. वह मुकाम हासिल करने में लगी हुई है. सुलेमान फार्मेसी का स्टूडेंट है. उसके भी अपने सपने हैं. यह पहली पीढ़ी है जो यहाँ पर पहुंची है. बाकी अब ये छोटे बच्चे इनको देखकर कुछ करना चाहते हैं. लेकिन तीनों शिक्षक फूल कॉन्फिडेंस में थे. शानदार हिंदी और इंग्लिश के शब्दों के साथ संवाद कर रहे थे. तालीम देने लायक शिक्षक लग रहे थे.

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गुज्जर बस्ती के मुखिया वसीम भाई कहते हैं हमारे यहाँ कोई नहीं पढ़ा. जंगलों में रहे दूध का काम किया और जिंदगी ऐसी ही जी ली. अब वन विभाग तंग करता है. कई बार बड़ी समस्या हो जाती है. वे भी मानते हैं वाइज ब्रिज ट्रस्ट जबसे आया हमारे बच्चों में काफी बदलाव आ गया है. हिंदी और थोड़ी बहुत अंग्रेजी के शब्द बोलना सीख गए हैं. भास्कर जी को धन्यवाद इसके लिए. मारिया मैडम को धन्यवाद. वसीम भाई के पास भैंसें हैं तकरीबन 25-30 और कुछ गाय हैं. अच्छी जानकारी है भैंसों की उनको. दूध ऋषिकेश जाता है. सभी गुज्जरों का यहाँ से. चाहे खुद ले जाओ या फिर लेने आ जाते हैं. कुल मिलाकर जंगल में इनकी आजीवका दूध के सहारे चल रही है. इसी जगह पर गणतंत्र दिवस मनाया गया. बच्चों ने राष्ट्रगान गाया. सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए. इस बस्ती के लिए बुजुर्ग और बच्चों दोनों के लिए यह पहला कार्यक्रम था.इस तरह का जलसा हुआ. वो भी देश पर्व के नाम पर. गणतंत्र दिवस पर. तिरंगे को सलामी दी गयी. ट्रस्ट के अध्यक्ष भास्कर ने बताया “मैं शुरू से ही इस समुदाय के प्रति जिज्ञासा में रहता था इनकी कैसे मदद की जाए और क्या किया जा सकता है इनके लिए इत्यादि. ऐसे सवालों से मन हमेशा द्रवित होता रहता था. फिर मैंने सोचा इनके लिए कुछ करना है सबसे पहले इनके बच्चों को शिक्षा का क …ख आना चाहिए. तब मैंने यहाँ पर तीन शिक्षक इन्ही के समुदाय के चुने. ये खुद भी पढ़ रहे हैं और इनको भी पढ़ा रहे हैं. इनको रोजगार छोटा मोटा मिल गया और तालीम भी देने लगे. कुछ उम्मीद बंधी. छह महीने पहले जब आये थे हम यहाँ पर कुछ खास प्रोग्रेस नहीं थी इन बच्चों की. अब बहुत बदलाव है. हिंदी बोलना सीख गए, इंग्लिश के कुछ शब्द बोल लेते हैं बच्चे. इनके माता पिता भी समझने लगे अब शिक्षा का कितना महत्त्व होता है करके. अब वे भी साथ देते हैं. भास्कर ने बताया जल्द वे डिजिटली जुड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन यहाँ पर मोबाइल के सिग्नल आते नहीं इंटरनेट कहाँ से जुड़ेगा? उसी में लगे हैं कुछ न कुछ उपाय हो जाए. ताकि ये बच्चे कल को देश की मुख्यधारा में जुड़ जाए. पढ़ लिख कर अपना और परिवार का विकास कर सकें. ये पढ़ेंगे तो समाज मजबूत होगा. समाज मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा…” हुकूमतें अपने कामों में ब्यस्त हैं, उनका जिक्र न करें तो गलत नहीं होगा. उनसे कुछ मांगना टेढ़ी खीर हुई. उम्मीद है इस पहल का प्रतिफल आने वाले समय में फलदायक रहेगा…

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