मैया मैं तो चंद खिलौना लैंहों…भारत माता की जय

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मैया मैं तो चंद खिलौना लैंहों…

नोएडा : (राजेश बैरागी) अब ऐसे मंगल गीत गाने का समय फिर लौट आया है।चंद्रयान-3 चांद पर जा पहुंचा। एक मशीन के किसी अनजान किंतु तय गंतव्य पर पहुंचने का यह ऐतिहासिक क्षण और उपलब्धि है। चंदा मामा दूर के नहीं एक टूर के रह गये हैं।उनके दूर होने,हाथ न आने, बादलों के पीछे छिप जाने,कृष्ण पक्ष में रोजाना छोटे होते जाना और शुक्ल पक्ष में रोजाना बड़े होते जाने के किस्से बीते जमाने की बात हो जाएंगी।आने वाले समय में संभव है कि वहां जाना दिल्ली से कोलकाता, चेन्नई या मुंबई सरीखा हो जाए।हो सकता है वहां रिहायश पर विचार होने लगे।हो सकता है वहां से कीमती खनिजों के ट्रक लदकर आने लगें। एक हजार बरस पहले पृथ्वी के अलग-अलग कोनों पर रहने वाले लोग भी एक से दूसरे स्थान पर जाने के बारे में ऐसी ही असंभव बातें किया करते थे।आज यह असंभव नहीं रहा।कल चांद पर सामान्य आवागमन असंभव नहीं रहेगा। हमें हमारे वैज्ञानिकों की मेधा और क्षमता पर कोई संदेह नहीं है।वे बहुत कुछ और वह सब कर सकते हैं जो किसी भी अन्य देश के वैज्ञानिक कर सकते हैं।

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यदि हम आज भी सफल नहीं होते तो?हो सकता है चांद पर पहुंचने की इच्छा दम तोड़ देती। चार वर्ष पहले भी हमने विफलता का कड़वा अनुभव किया था। परंतु देश के राजनीतिक नेतृत्व और वैज्ञानिकों ने तब हार नहीं मानी तो आज की इस महान उपलब्धि तक पहुंच ही गए।हर असफलता आगामी सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। चंद्रयान-3 की कामयाबी इसी सिद्धांत की पुष्टि करती है।

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