ऋषिकेश : आद्य जगद्गुरु श्री स्वामी रामानन्दाचार्य महाराज का 725वां जयन्ती महोत्सव, जानें

- “रामानन्द: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले”
ऋषिकेश : जगद्गुरु श्री स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के महान सन्त थे। उन्होंने श्री राम भक्ति की धारा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाया। वे पहले ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार किया।उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार करने का श्रेय जगद्गुरु श्री स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज को जाता है।जगद्गुरु श्री स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज का जन्म प्रयागराज में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।उनकी माता जी का नाम श्रीमती सुशीला देवी एवं पिताजी का नाम श्री पुण्य सदन जी था। गुरु देव जी का नाम श्री राघवानन्दाचार्य जी महाराज था।
धार्मिक विचारों वाले उनके माता-पिता ने बालक रामानन्द को शिक्षा पाने के लिए काशी के स्वामी श्री राघवानन्दाचार्य जी महाराज के पास श्रीमठ काशी भेज दिया। श्रीमठ में रहते हुए उन्होंने वेद,पुराण, शास्त्र एवं उपनिषदों का अध्ययन किया। काशी में पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में रहते हुए उन्होंने कठोर साधना कर सिद्धियां प्राप्त की।स्वामी श्री रामानन्दाचार्य जी का जन्म विक्रम संवत 1356 में हुआ था। स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज ने राम भक्ति का द्वार सबके लिए सुलभ कर दिया। उन्होंने अनन्तानन्द,भावानंद,पीपानन्द,से ननाई, धन्ना जाट, कबीर दास, रैदास दास,नरहर्यानन्द, सुखानन्द गालवानन्द सुरसुरानन्द, पद्मावती जैसे बारह लोगों को अपना प्रमुख शिष्य बनाया। जिन्हें द्वादश महाभागवत के नाम से जाना जाता है। इन्हें अपने अपने समाज एवं क्षेत्र में भक्ति का प्रचार करने का दायित्व सौंपा गया। इनमें श्री कबीर दास जी एवं श्री रैदास दास जी ने आगे चलकर बहुत सिद्धियां अर्जित कर ख्याति प्राप्त की। श्री कबीर दास एवं श्री रैदास दास ने निर्गुण राम की उपासना की। इस लिए श्री रामानन्दी सम्प्रदाय में सगुण एवं निर्गुण दोनों प्रकार के सन्त उपासक होते हैं और विशिष्टाद्वैत सिद्धांत को मानते हैं। स्वामी रामानन्दाचार्य महाराज ने भक्ति का मार्ग सबके लिए खोल दिया, उन्होंने कहा – “जात-पात पूछे ना कोई,हरि को भजै सो हरि का होई”। उन्होंने महिलाओं एवं पुरुषों को भक्ति करने के बराबर अधिकार दिया।
वैष्णवों के 52 द्वारों में, 36 द्वारे केवल श्री रामानन्दी सम्प्रदाय वैरागियों के हैं। श्री रामानन्दी सम्प्रदाय वैष्णव बैरागी संन्यासी साधुओं का बहुत बड़ा धार्मिक जमात है। श्री रामानन्दी सम्प्रदाय की शाखाएं – उपशाखाएं देश विदेश में फैली हुई हैं।इनके अपने अखाड़े भी हैं। काशी का श्रीमठ सगुण और निर्गुण राम भक्ति परम्परा और रामानन्दी सम्प्रदाय का मूल आचार्य पीठ है।जगद्गुरु श्री स्वामी रामानन्दाचार्य महाराज ने श्री राम भक्ति का प्रचार- प्रसार करने के लिए सम्पूर्ण भारत की यात्राएं की। उन्होंने अपनी उपासना पद्धति में भगवान श्री “सीताराम” जी को वरीयता दी और उन्हें ही अपना उपास्य बनाया। स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज ने राम भक्ति की पावन धारा को गरीबों, वंचितों, आदिवासियों की झोपड़ियों तक पहुंचाया।
इनकी चरण पादुकायें आज भी श्रीमठ काशी में सुरक्षित हैं,जो करोड़ों राम भक्तों की आस्था का केन्द्र है। स्वामी रामानन्दाचार्य ने भक्ति के प्रचार-प्रसार में संस्कृत की जगह लोकभाषा को प्राथमिकता दी। उन्होंने अनेकों पुस्तकों की रचना की, जिसमें आनन्द भाष्य पर टीका एवं वैष्णवमताब्ज भास्कर उनकी प्रमुख रचना है।भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य और संस्कृति के विकास में भागवत धर्म तथा वैष्णव भक्ति से संबद्ध वैचारिक क्रांति में स्वामी रामानन्दाचार्य महाराज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
स्वामी रामानंद जी ने तत्कालीन समाज में घोर वैमनस्यता एवं कटुता को दूर कर हिन्दू समाज को एक सूत्र में बांधने का महान कार्य किया। स्वामी रामानन्दाचार्य जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को आदर्श मान कर स्वयं श्री राम भक्ति का प्रचार प्रसार करते हुए अपने शिष्यों, प्रशिष्यों को भी आदेश दिया, ताकि अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके।इस सम्प्रदाय के सन्तों को बैरागी सन्त कहा जाता है। श्री रामानन्दाचार्य जी ने बिखरे हुए हिन्दू समाज को संगठित कर मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति -पांति ऊंच नीच के भेद को मिटा कर भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से सुलभ किया। स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज ने सभी जातियों, सभी वर्णों के महिलाओं पुरुषों को श्री “राममंत्र”देने में कोई संकोच नहीं किया, बल्कि सभी को श्री राम भक्ति करने का अधिकार दिया। उन्हीं के चलते तीर्थ क्षेत्रों की रक्षा, सांस्कृतिक केन्द्रों की स्थापना,मठ मंदिर आश्रम एवं वैदिक सनातन धर्म की रक्षा संभव हो सकी।
स्वामी रामानंद जी ने तत्कालीन मुगल शासक मोहम्मद तुगलक द्वारा हिन्दुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध एवं बारह जजियाकर को हटाने का निर्देश दिया। बलपूर्वक इस्लाम धर्म में दीक्षित हिन्दूओं को फिर से हिन्दू सनातन धर्म में घर वापसी परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्व प्रथम जगद्गुरु श्री स्वामी रामानन्दाचार्य जी महाराज ने ही प्रारम्भ किया। इतिहास साक्षी है कि राजा हरिसिंह के नेतृत्व में चौंतीस हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामी रामानन्दाचार्य जी ने सनातन धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया था। ऐसे महान सन्त,परम विचारक, हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने वाले, परस्पर आत्मीयता, सनातन धर्म रक्षार्थ विराट संगठित शक्ति खड़ा करने वाले, समन्वयी जगद्गुरु जी का 725वां अवतरण दिवस माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी, विक्रम संवत 2081,दिनांक -21/01/2025 को, विरक्त वैष्णव मण्डल समिति ऋषिकेश,अखिल भारतीय संत समिति ऋषिकेश एवं समस्त हिन्दू समाज द्वारा हर्षोल्लास पूर्वक श्री रामानन्द संत आश्रम माया कुण्ड ऋषिकेश उत्तराखंड में मनाया जा रहा है। जिसमें सर्व हिन्दू समाज सपरिवार सप्रेम सादर आमंत्रित हैं।



